Thursday, April 16, 2026
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लोक ही नहीं परलोक सुधारने का जतन है ‘मां के नाम एक पेड़’

– डॉ. राघवेन्द्र शर्मा

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा से ‘मां के नाम एक पेड़’ योजना को हाथ में लेकर केवल पर्यावरण को सुधारने का प्रयास ही नहीं किया है, बल्कि इसके माध्यम से प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। यदि इस योजना को साकार करने हेतु सरकार के साथ जनता जनार्दन के कदम मिल जाएं तो आने वाले समय में एक नए भविष्य की संभावना प्रबल होती दिखाई देती है। जनश्रुति और ग्रंथों में दर्ज परंपराओं पर ध्यान दें तो हमें पता चलेगा कि भारतीय संस्कृति और संस्कार, दोनों इस प्रकृति के प्रादुर्भाव से ही पर्यावरण के हितकारी रहे हैं। उदाहरण के लिए- हमारे देश में आस्था का इतना गहन महत्व है कि यहां अनेक नदियों को मां के समान पूजा जाता है। पत्थरों से मूर्तियां तराशकर हम उनके भीतर अपने देवताओं के दर्शन करते हैं। इसे भी महत्वपूर्ण स्थान हमारे जीवन में पेड़-पौधों और वृक्षों का रहा है। वर्ष भर जितने भी हिंदू त्योहार मनाए जाते हैं उनमें ढेर सारे उत्सव ऐसे हैं, जिनमें केवल और केवल वृक्षों अथवा पेड़-पौधों की ही पूजा की जाती है। विस्तार से स्मरण करें तो हम पाएंगे हमारी माताएं बहने विभिन्न त्योहारों के माध्यम से वट वृक्ष, पीपल, आंवला, आम, केला, तुलसी सहित अनेक वृक्षों अथवा पेड़ पौधों की स्तुति करती रहती हैं। ये परंपराएं केवल इसलिए नहीं बनीं कि वृक्षों अथवा पेड़- पौधों की पूजा करने से हमें इच्छित फल की प्राप्ति हो जाती है अथवा देवी- देवताओं के दर्शन हो जाते हैं। इनका गूढ़ अर्थ यह भी है कि हम जिन्हें पूजते हैं, सदैव ही उनकी सलामती की कामना करते रहते हैं।

लिखने का आशय यह कि जब हम वृक्षों अथवा पेड़-पौधों की पूजा करते हैं तो फिर यह चिंता भी स्वाभाविक हो जाती है कि धरती को हरा भरा बनाए रखने वाले ये पेड़ पौधे सदैव सही सलामत बने रहें तथा इनकी उत्पत्ति निरंतर वृद्धि को प्राप्त होती रहे। जाहिर है इस कामना को फलीभूत करने के लिए हमारे पूर्वज बड़े स्तर पर पौधरोपण भी करते रहे हैं। यदि हम अपने पुराने इतिहास को टटोलें तो पाएंगे कि भारत में ऐसे नगरों और ग्रामों की भरमार थी, जहां सड़कों के किनारे, घरों के आंगन में, बस्तियों के केंद्र में फलदार वृक्ष सहज भाव से ही आरोपित किए जाते थे और इनका अस्तित्व जनजीवन के लिए वरदान साबित होता रहता था। मौसम कोई भी हो, गर्मी सर्दी अथवा बारिश, यह सब जीव मात्र के प्रति अनुकूल तो बने ही रहते थे। ना ज्यादा सर्दी होती थी और ना अधिक गर्मी पड़ा करती थी। बारिश के मौसम में भी अतिवृष्टि और सूखे से राहत बनी रहती थी। कारण स्पष्ट है वृक्षों की अधिकता मौसम में अनुकूलता बनाए रखती थी। यदि विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो फिर यह मानना पड़ेगा कि हमारे पूर्वज और संत महात्मा शेष सभ्य समाज की अपेक्षा अधिक चैतन्य एवं जागरूक थे। वे जानते थे कि जीव मात्र का अस्तित्व बचाए रखने के लिए वृक्षों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अर्थात वृक्षों को जीवन दाता माना गया तभी उसके पूजन और स्तुति की स्थितियां निर्मित हुईं और आम जनमानस को प्रकृति के साथ जोड़ दिया गया।

यदि हमारे धार्मिक ग्रंथो की बात की जाए तो उनमें यह उल्लेख भी पढ़ने को मिलता है कि कोई व्यक्ति एक वृक्ष को धरती पर रोपता है और उसकी पूरी तन्मयता से उसकी देखभाल करते हुए ठीक ढंग से उसका पालन पोषण करता है, तो वह अनेक सुफलों का अधिकारी हो जाता है। हिंदू धर्म में कहा तो यहां तक गया है कि किसी पुरुष अथवा नारी द्वारा दस बच्चों को जन्म देने और उनके पालन पोषण करके उन्हें सभी प्रकार से योग्य बनाने के बाद जो सुफल प्राप्त होते हैं वह सब केवल एक वृक्ष को लगाने से ही प्राप्त हो जाते हैं।

लिखने का आशय यह की पृथ्वी का संतुलित पर्यावरण अधिकांशतः पेड़ों पर ही टिका हुआ है। यदि पेड़ पर्याप्त मात्रा में है तो उनके द्वारा अतिरिक्त ताप को सोख लिया जाता है। यदि मानवीय गलतियों से नुकसानदायक गैसों का उत्सर्जन होने लगता है तो उन्हें भी पेड़ों की अधिकता के चलते निस्तेज किया जा सकता है। यदि पृथ्वी पर पेड़ पौधे पर्याप्त हैं तो वे सब मिलकर जलवायु परिवर्तनों को संतुलित बनाए रखते हैं। अर्थात समय पर बारिश होती है और उतनी ही होती है जिससे ना तो सूखा रह जाए और ना ही बाढ़ अथवा प्रलय के हालात बनें। दुख की बात यह है कि आजादी के बाद से लेकर अभी तक जितनी भी सरकारें अधिकतम समय तक शासन करती रहीं, उन्होंने कभी इस अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू पर गंभीरता के साथ गौर किया ही नहीं। बस वृक्षारोपण के नाम पर करोड़ों अरबों रुपय स्वाह किए जाते रहे। इस पुण्य कार्य की आड़ में भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार होता रहा। कागजों में वृक्षारोपण होते रहे, जो थोड़े बहुत वृक्षारोपण हुए भी तो देखभाल के अभाव में उन्होंने दम तोड़ दिया। नतीजा यह निकला कि विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ काटे जाते रहे। जबकि उसके विपरीत वृक्षों को पर्याप्त मात्रा में नहीं रोपा गया। नतीजा हम सबके सामने हैं। गर्मियां और अधिक जानलेवा हो रही हैं।सर्दियों के मौसम में भी लोग पहले की अपेक्षा अधिक दम तोड़ने लगे हैं। बारिशों का हाल यह है कि कहीं पानी का अभाव रह जाता है तो कुछ इलाकों में इतनी आतिवृष्टि होती है कि बाढ़ और प्रलय के हालात बन जाते हैं।

लेकिन अब भारत की प्रकृति और प्रवृत्ति परिवर्तित हो रही है। क्योंकि देश में जन सरोकारों के प्रति सदैव ही चिंतित बने रहने वाले प्रधानमंत्री मोदी की सरकार है। उन्होंने वृक्षारोपण को केवल औपचारिकता से अलग हटकर उसे संस्कृति और संस्कारों से जोड़ने का बीड़ा उठाया है। अपनी इसी मंशा को पूरा करने की दृष्टि से उन्होंने एक पेड़ मां के नाम योजना का शुभारंभ किया है। जाहिर है उनके द्वारा यह विधि इसलिए अपनी गई है ताकि लोग वृक्षारोपण के लिए केवल फॉर्मेलिटी ना करें। बल्कि पूरी गंभीरता से पौधे को रोपें और एक बच्चे की तरह उसका तब तक लालन पालन करते रहें, जब तक कि वह पर्यावरण को अनुकूलता प्रदान करने वाला आत्मनिर्भर वृक्ष नहीं बन जाए। वृक्षारोपण करने वालों में गंभीरता और समर्पण का भाव बना रहे, इसी दृष्टि से प्रधानमंत्री मोदी ने इस कार्यक्रम के साथ मां को जोड़ दिया है। उनके इस विचार की जितनी प्रशंसा की जाए कम है और बुद्धिजीवी लोग प्रशंसा कर भी रहे हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक ऐसे ही सच्चे प्रशंसक हैं। यही वजह है कि उन्होंने एक पेड़ मां के नाम योजना को पूरी गंभीरता से लिया है। बेशक इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए कोई कानून नहीं बनाया गया है। ना ही इस आशय के निर्देश हैं कि सभी को ऐसा करना ही होगा। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जनता जनार्दन से आग्रह किया गया है कि सब लोग अपनी मां के नाम का एक पौधा अवश्य रोपें । लेकिन बात केवल जनहित की न होकर जीव मात्र के हित की है। इसलिए जो लोग पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि, वायु पंच महाभूतों का सम्मान करते हैं, उनके द्वारा इस योजना को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और लिया भी जा रहा है।

ऐसे जागरूक जनप्रतिनिधियों की ही तरह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री यादव ने एक पेड़ मां के नाम योजना को पूरे प्रदेश में अमली जामा पहनाने के पुख्ता इंतेजामात किए हैं। पौधों की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। ताकि बारिश के मौसम में जो लोग पौधरोपण करना चाहें उन्हें पौधों की कमी आने ना पाए। साथ ही यह आग्रह किया जा रहा है कि जो लोग पौधरोपण कर रहे हैं, वे अपने पौधे को पहचान कर रखें। उसे ठीक उसी प्रकार पालते पोसते रहें ,उसकी देखभाल करते रहें ,जब तक कि वह आत्मनिर्भर वृक्ष के रूप में स्थापित न हो जाए। यदि सभी लोगों ने संकल्प ले लिया और बारिश के मौसम में सभी ने एक-एक पेड़ का रोपण किया तथा उसकी वांछित देखभाल की तो दावा किया जा सकता है कि हमारे इन प्रयासों का निकट भविष्य में बहुत अच्छा परिणाम वरदान के रूप में हमें प्राप्त होने वाला है। अंत में सभी से अपील है कि हम अपनी मां की स्मृति में पौधरोपण का संकल्प लें और इस बारिश के मौसम में कम से कम एक पौधा अवश्य रोपें तथा उसकी पूरी देखभाल करें।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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