बारामती: आज बारामती की सड़कों पर भीड़ थी, लेकिन सन्नाटा था। नारे थे, मगर आवाज़ें कांप रही थीं। महाराष्ट्र ने आज अपना ‘दादा’ खो दिया। उपमुख्यमंत्री अजित पवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई, लेकिन उनका जाना लोगों के दिलों में खालीपन छोड़ गया।
सुबह से ही उमड़ा जनसैलाब
सुबह होते ही विद्या प्रतिष्ठान मैदान के बाहर लोगों की लंबी कतारें लग गईं। किसान, महिलाएं, बुज़ुर्ग और युवा—हर कोई सिर्फ एक झलक चाहता था। कोई हाथ जोड़कर खड़ा था, तो कोई फूट-फूटकर रो रहा था। लोगों के चेहरों पर एक ही सवाल था—“अब हमारे लिए कौन बोलेगा?”
जब बेटे ने दी पिता को मुखाग्नि
दोपहर के वक्त पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। राष्ट्रध्वज में लिपटे अजित पवार के पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई दी गई। उनके पुत्र पार्थ पवार और जय पवार ने मुखाग्नि दी। यह पल केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र के दर्द का प्रतीक बन गया।
‘अजित दादा अमर रहें’ से गूंजा बारामती
अंतिम यात्रा के दौरान समर्थकों ने ‘अजित दादा अमर रहें’ के नारे लगाए। सड़क के दोनों ओर खड़े लोग फूल बरसाते रहे। ऐसा लग रहा था मानो पूरा शहर अपने नेता को आखिरी बार गले लगाना चाहता हो। सत्ता और विपक्ष—हर दल के नेता अंतिम संस्कार में मौजूद रहे। सबकी जुबान पर एक ही बात थी—
अजित पवार जैसा जमीनी और निर्णायक नेता दोबारा मिलना मुश्किल है।
विमान हादसे ने छीन लिया सब कुछ
28 जनवरी को हुए विमान हादसे ने महाराष्ट्र की राजनीति को झकझोर दिया। एक पल में सब कुछ बदल गया। सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया, लेकिन लोगों का शोक इससे कहीं गहरा है।
एक नेता नहीं, एक भरोसा चला गया
अजित पवार सिर्फ एक पद नहीं थे। वह किसी के लिए आवाज़ थे, किसी के लिए हिम्मत और किसी के लिए आखिरी उम्मीद। आज उनकी विदाई के साथ एक पूरा युग खत्म हो गया। बारामती आज शांत है… लेकिन सूनी है।
