नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो प्रकरण में गुजरात सरकार को बड़ा झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार का फैसला रद्द करते हुए कहा है कि गुजरात सरकार को गुन्हेंगारों की शिक्षा कम करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि इस मामले की सुनवाई मुंबई हाईकोर्ट में हुई थी. इसके कारण गुजरात सरकार को शिक्षा रद्द करने से पहले मुंबई हाईकोर्ट की सलाह लेनी चाहिए थी, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए कहा है.
क्या है बिलकिस बानो प्रकरण ?
27 फरवरी 2002 को गोधरा स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस के डबे में कुछ लोग आए थे. इस घटना में आयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवकों की मौत हो गई थी. इस घटना के बाद पूरे देश में हंगामा हो गया था और गुजरात में दंगे उत्पन्न हो गए थे. इस दंगे के कहर में बिलकिस बानो का परिवार भी हताहत हो गया था.
3 मार्च 2002 को गुजरात में हुई दंगे में बिलकिस बानो का परिवार पहुंचा. बिलकिस, जो उस समय 21 वर्ष की थीं, उनके परिवार में 15 सदस्य थे, जिनमें बिलकिस और उनकी साढ़े तीन साल की बेटी भी शामिल थी. जैसा कि आरोप पत्र में बताया गया है, बिलकिस के परिवार पर 20-30 लोगों ने छुरी, तलवार और अन्य हथियार लेकर हमला किया था. इसमें वे 11 लोग भी शामिल हैं जिन्हें इस मामले में दोषी ठहराया गया था.
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जिन्होंने बिलकिस बानो के परिवार पर हमला किया. उसने बिलकिस बानो, उसकी मां और परिवार की तीन अन्य महिलाओं के साथ बलात्कार किया. परिवार के सभी सदस्यों को जमकर पीटा गया. हमले में परिवार के 17 सदस्यों में से सात की मौत हो गई. छह लोग लापता हो गए. हँसते-खेलते परिवार के केवल तीन सदस्य जीवित बचे. इसमें बिलकिस के परिवार का एक सदस्य और तीन साल का बच्चा भी शामिल था. जब ये घटना घटी तब बिलकिस बानो पांच महीने की गर्भवती थीं. दंगाइयों की क्रूरता के बाद बिलकिस बानो करीब तीन घंटे तक बेहोश रहीं.
बिलकिस बानो केस को सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया गया. सीबीआई ने इस केस की जांच नए सिरे से शुरू कर दी है. जांच में पता चला कि मृतक का पोस्टमार्टम भी ठीक से नहीं किया गया था. इस हमले में मारे गए लोगों के शवों को सीबीआई ने बाहर निकाला, उस वक्त सीबीआई की जांच में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया. पाया गया कि इनमें से किसी भी शव की खोपड़ी नहीं थी. सीबीआई के मुताबिक, सीबीआई जांच में पता चला कि पोस्टमार्टम के बाद शवों को क्षत-विक्षत कर दिया गया था, जिसके कारण शवों की पहचान नहीं हो सकी.
जब मुकदमा चल रहा था तब बिलकिस बानो को जान से मारने की धमकियाँ मिलने लगीं. इसके बाद जांच गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में की गई. मुंबई की एक अदालत में छह पुलिस अधिकारियों और एक डॉक्टर सहित कुल 19 लोगों पर आरोप लगाए गए. जनवरी 2008 में, एक विशेष अदालत ने 11 आरोपियों को बलात्कार, हत्या, गैरकानूनी सभा और अन्य आरोपों में दोषी ठहराया. वहीं, कोर्ट ने बिलकिस की रिपोर्ट लिखने वाले हेड कांस्टेबल को भी आरोपियों को बचाने के लिए गलत रिपोर्ट लिखने का दोषी करार दिया है. सात अन्य आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया. इसी बीच एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई.
11 आरोपियों में जसवंतभाई नाई, गोविंदभाई नाई, नरेश कुमार मोरधिया (मृतक), शैलेश भट्ट, राधेश्याम शाह, बिपिन चंद्र जोशी, केसरभाई वोहनिया, प्रदीप वोहनिया, बाकाभाई वोहनिया, राजूभाई सोनी, नितेश भट्ट, रमेश चंदना और हेड कांस्टेबल सोमाभाई घोरी शामिल हैं. था बिलकिस बानो के साथ जसवन्त, गोविंद और नरेश ने बलात्कार किया था. उसी समय शैलेश ने बिलकिस की बेटी सालेहा को जमीन पर पटक कर मार डाला.
मई 2017 में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने सामूहिक बलात्कार मामले में 11 लोगों की उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा. साथ ही, एक पुलिसकर्मी और एक डॉक्टर समेत सात अन्य को बरी कर दिया गया. अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को बिलकिस को दो हफ्ते के अंदर 50 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था.
बलात्कार और हत्या के दोषीयों को शिक्षा गुजरात सरकार ने किस आधार पर कमी की?
बिलकिस बानो प्रकरण में 11 दोषीयों को शिक्षा में कमी करने का निर्णय गुजरात सरकार ने लिया था. दोषीयों में से एक राधेश्याम शाह ने सर्वोच्च न्यायालय में माफी के लिए याचिका दाखिल की थी. न्यायालय ने इस याचिका को मान्यता दी और उसे माफी मिली.
गुजरात सरकार ने इसके लिए एक समिति गठित की थी. इस समिति ने माफी की याचिका को मंजूरी दी. इसके बाद दोषीयों को शिक्षा में कमी करके उन्हें छोड़ने का निर्णय लिया गया.
बिलकिस बानो की गुजरात सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में धाव
बिलकिस बानो ने गुजरात सरकार के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में धाव ली. सर्वोच्च न्यायालय ने बिलकिस बानो की याचिका को सुनावणी के लिए स्वीकार किया और इस सुनावणी के दौरान गुजरात सरकार को बड़ा झटका दिया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुनावणी करते हुए सर्व 11 दोषीयों को माफी रद्द की.
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