Monday, March 23, 2026
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आरएसएस से नफरत करनेवालों को जस्टिस चितरंजन दास की बातों को गंभीरता से लेना चाहिए

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

समय कभी ठहरता नहीं, वक्‍त की गति के साथ जो ताल से ताल मिलाकर चलता है, वह इतिहास नहीं बनता, अपने समय में वह सदैव वर्तमान बना रहता है। एकात्‍म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय ने राष्‍ट्र की चिति का जिक्र अपने भाषणों में कई बार किया था। उनके अनुसार ‘जब लोगों का एक समूह किसी लक्ष्य, आदर्श, मिशन के साथ रहता है और किसी खास भूमि के टुकड़े को मातृभूमि के रूप में देखता है, तो यह समूह एक राष्ट्र का निर्माण करता है। अगर दोनों में से कोई एक- आदर्श और मातृभूमि नहीं है, तो कोई राष्ट्र नहीं है। किसी राष्ट्र का आदर्श या मूल सिद्धांत उसकी आत्मा है। एक व्यक्ति के मामले में, उसकी आत्मा बार-बार जन्म ले सकती है। हर बार एक अलग अस्तित्व होता है, लेकिन आत्मा एक ही होती है। इसी तरह, एक राष्ट्र की एक आत्मा होती है। इसका तकनीकी नाम ‘चिति’ है। चिति मौलिक है और राष्ट्र के लिए इसकी शुरुआत से ही केंद्रीय है। व्यक्ति राष्ट्र की आत्मा ‘चिति’ को सामने लाने का भी साधन है। इस प्रकार व्यक्ति अपने स्वयं के अलावा राष्ट्र का भी प्रतिनिधित्व करता है। ’

भारत के परिप्रेक्ष्‍य में इस चिति की समीक्षा करें तो यह अनन्‍त काल से यहां की हवा में स्‍व स्‍फुरित है। कई बार इसकी गति कम और अनेक बार तेज होती दिखती है। कई धाराओं में प्रवाहमान भी यह देखी जाती रही है। ऐसे में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ यानी आरएसएस वह संगठन है, जो इन अनेक धाराओं को राष्‍ट्र की चिति की पुष्‍टता के लिए एक साथ जोड़कर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा का काम करता हुआ दिखाई देता है। इसमें भी सुखद यह है कि संघ अपने इस कार्य को अनेक अलोचनाओं को सहते-सुनते पिछले 99 सालों से अनवरत कर रहा है।

सांप्रदायिक, हिंदूवादी, फासीवादी, धर्मनिरपेक्षता का दुश्‍मन, सांप्रदायकिता की खाई खोदनेवाला और इसी तरह के अन्य न जानें कितने शब्दों एवं उपमाओं से संघ को लगातार नवाजा जा रहा है। उसे अपमानित करने का कोई एक पल भी उसकी बातों में असहमति रखनेवाले छोड़ना नहीं चाहते, किंतु रा.स्‍व.संघ है कि इन सभी बातों पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए धैर्य के साथ अपने कार्य में जुटा हुआ है और वह कार्य प्रारंभ से अंत तक एक ही है, अनेक धाराओं को एक साथ लाकर राष्‍ट्र की चिति को मजबूत करना । इसलिए संघ कभी अतीत नहीं हुआ, वह वर्तमान है।

आज कलकत्ता और ओडिशा हाई कोर्ट में जज रह चुके रिटायर्ड जस्टिस चितरंजन दास यह कहकर और इस संगठन के बारे में स्‍पष्‍ट कर देते हैं कि मैं आरएसएस में था, यह कोई अछूत संगठन नहीं। किसी को अपनी पहचान छिपाने की जरूरत नहीं है। एक जज रहते हुए उन्होंने संविधान के मुताबिक काम किया और उनकी व्यक्तिगत विचारधारा कभी आड़े नहीं आई। संघ में हर विचारधारा के लोग रहते हैं और यह संगठन किसी को किसी विचारधारा के लिए बाध्य नहीं करता है।

जस्टिस दास इस बात पर भी जोर देते हैं कि आरएसएस अपने 100 साल पूरे करने जा रहा है। आरएसएस को कई लोग अछूत संगठन मानते हैं लेकिन इस संगठन ने किसी के माइंड वॉश की कोशिश कभी नहीं की। मुझे इसका व्यक्तिगत अनुभव है। आरएसएस लोगों के व्यक्तित्व को निखारता है। यह लोगों को अच्छा नागरिक बनाता है और चाहे कोई प्रधानमंत्री हो, जज या कलेक्टर हो। हर किसी को राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा देता है। यह सच है कि संघ कोई क्रांतिकारी संगठन नहीं, लेकिन इतिहास में पता चलता है कि इंदिरा गांधी को भी आरएसएस की मदद लेनी पड़ी थी। चीन से युद्ध के समय भी संघ ने काफी काम किया था। ये चीजें लोगों को बताई नहीं जाती हैं। आरएसएस यही कहता है कि आपको अपने कार्य के प्रति प्रतिबद्ध रहना है। कई लोगों ने गलत जानकारी देकर इस संगठन की छवि धूमिल करने की कोशिश की जाती रही है।

वस्‍तुत: यहां जस्टिस दास पुन: स्‍पष्‍ट करते चलते हैं कि (रास्‍वसंघ) इससे मेरा काम कभी प्रभावित नहीं हुआ। एक जज रहते हुए मैं संविधान के प्रति वफादार रहा। आप हमारे कई फैसले देख सकते हैं। आरएसएस आपसे कभी राइट या लेफ्ट में जाने को नहीं कहता है। कई बार हमारे फैसलों में कांग्रेस और टीएमसी नेताओं को भी राहत मिली। मैंने यह कभी नहीं सोचा कि जो बीजेपी के खिलाफ हैं वे हमारे दुश्मन हैं। हमने कानून के मुताबिक ही सबके साथ व्यवहार किया और यही आरएसएस की मूल दृष्‍टि है। व्‍यक्‍ति जहां है, जिस भी दायित्‍व पर है, वहां रहते हुए वह अपने राष्‍ट्र के हित में अपना सर्वस्‍व समर्प‍ित करे।

निश्चित ही यहां जस्टिस दास के आरएसएस को लेकर आए अनुभव को जानने के बाद यही कहना होगा कि प्रतिदिन संघ में की जानेवाली उसकी प्रार्थना एक स्‍वयंसेवक को इतना अधिक अपने राष्‍ट्र के लिए समर्प‍ित हो जाने की प्रेरणा देती है कि उसके लिए फिर राष्‍ट्र की सर्वोच्‍चता ही महत्‍व रखती है, जिसमें कि स्‍वयं को वह विलीन कर देने में ही अपनी सार्थकता समझता है और इसी में अपने जीवन की धन्‍यता स्‍वीकारता है।

प्रार्थना के प्रथम श्लोक स्‍वयंसेवक मातृभूमि के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है। मातृभूमि को सर्वोच्च स्थान पर रखते हुए इस मातृभूमि की विशेषताओं का स्मरण कर उसके लिए स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लेता है। “मातृभूमि के प्रति मेरा सर्वस्वार्पण हो जाये ऐसी अभिलाषा स्वयंसेवक “पतत्वेष कायो” के रूप में व्यक्त करता है। समर्पण केवल एक वचन में अर्थात् स्वयं का ही होता है। कोई दूसरा बलिदान करेगा तब में करूँगा या हम सब बलिदान करेंगे यहां ऐसा बिल्‍कुल नहीं है।”

संपूर्ण प्रार्थना में पांच गुण स्‍वयंसेवक अपने लिए भारत माता से मांगता है। ये पाँच गुण हैं, एक – अजेय शक्ति (ऐसी शक्ति जिसको विश्व में कोई जीत न सके)। दो- सुशील (ऐसा श्रेष्ठ शील (चरित्र) माँगा है, जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये)। तीन- श्रुतं (ऐसा ज्ञान भी माँगा है जो सभी कठिनाईयों तथा समस्याओं में से मार्ग प्रशस्त कर दे तथा कभी कोई विभ्रम न हो)। स्वयं स्वीकृतं कण्टकाकीर्ण मार्गम् के माध्‍यम से कहा गया है, कष्टों (चुनौतियों) से भरा यह कार्य हमने अपने मन, बुद्धि और आत्मा से स्वयं के लिए स्वीकार किया है। चार- वीरव्रत (समुत्कर्ष निःश्रेयस – इस लोक तथा ऊर्ध्‍वलोक का उत्कर्ष (वैभव) ऐहिक एवं पारलौकिक कल्याण तथा मोक्ष दोनों वीरव्रती को ही मिलते हैं। ऐसा वीरव्रत भी ईश्वर से माँगा है। (वीरव्रत अर्थात् विषम परिस्थितियों में भी जो धैर्य रखते हुए अपने लक्ष्य की और अग्रसर रहे वीरव्रती कहलाता है)। पांच – अक्षय ध्येयनिष्ठा (जीवन में ध्येय का स्मरण और उसके प्रति निष्ठा अक्षय बनी रहे यानी कि जीवन की अन्तिम श्वास तक इस कार्य के प्रति मेरी भावनाएं तथा मेरा समर्पण बाधित या समाप्त न हो । ऐसे आशीर्वाद के रूप में “ध्येय निष्ठा” अन्तिम गुण माँगा गया है)।

निश्‍चित ही इन गुणों से आबद्ध स्‍वयंसेवक हंसते हुए अपनी सभी आलोचनाओं को सह जाता है। लोग उसे बदनाम करने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचते हैं, किंतु संघ और स्‍वयंसेवक दिन-रात अपने राष्‍ट्र कार्य में लगे हुए हैं। इसलिए संघ को बदनाम करने का नैरेटिव बार-बार ध्‍वस्‍त होता है। अपने जन्‍मकाल से अब तक इतिहास में संघ अपने को बार-बार सिद्ध करता रहा है। आज स्‍वयंसेवक हर दिशा में और हर क्षेत्र में सेवाकार्य करते हुए भारत माता को शक्‍ति सम्‍पन्‍न और वैभव संपन्‍न बनाने की दिशा में अग्रसर हैं। सच कहें तो जस्टिस दास की कहीं बातें इसका यथार्थ चित्रण ही है। अब आरएसएस का बेकार में बिना जाने विरोध करनेवाले और आलोचना करने वाले इस मर्म को समझेंगे जरूर, यही आशा है।

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