नई दिल्ल: तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्राअब ‘पूर्व’ सांसद बन गई हैं। उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गई है। उनसे कैश फॉर क्वेरी मामले में पूछताछ की जा रही थी। जिसमें वह दोषी पाई गई थीं, इस मामले में संसद में 1 घंटे 6 मिनट तक चर्चा हुई। अंततः संसद में बहुमत से उनकी सदस्यता रद्द करने का निर्णय लिया गया। इस मामले में नियुक्त एथिक्स कमेटी की रिपोर्ट में महुआ मोइत्रा के व्यवहार को अनैतिक और अशोभनीय बताया गया था। महुआ मोइत्रा पर कार्रवाई के बाद इसकी तुलना राहुल गांधी मामले से की जा रही है। हालांकि, इन दोनों मामलों में बहुत बड़ा अंतर है।
मोइत्रा ने किया गैरकानूनी कार्रवाई का दावा
महुआ मोइत्रा बंगाल के कृष्णानगर लोकसभा क्षेत्र से चुनी गई थीं। पूर्व सांसद महुआ मोइत्रा के खिलाफ कार्रवाई के बाद तृणमूल कांग्रेस ने उनके साथ खड़े रहने का वादा किया है। वहीं मोइत्रा ने दावा किया है कि ये कार्रवाई पूरी तरह से गैरकानूनी है। उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सदन और सदन के बाहर सत्तारूढ़ भाजपा से लड़ाई जारी रहेगी।
इन सबके बीच कई बड़े सवाल भी खड़े हुए हैं। जैसे अब महुआ मोइत्रा के पास क्या विकल्प हैं? क्या वे इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती हैं? क्या कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप कर सकता है? महुआ मोइत्रा और राहुल गांधी का मामला कैसे अलग है? आइए जानते हैं।
महुआ का निष्कासन राहुल गांधी से कैसे अलग है?
कांग्रेस नेता सांसद राहुल गांधी ने एक सभा में बोलते हुए ‘मोदी’ सरनेम पर टिप्पणी की थी। उनके खिलाफ सूरत कोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर किया गया था। इसमें उन्हें दोषी पाया गया और दो साल की सजा सुनाई गई। कोर्ट के इस फैसले के बाद राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गई। हालांकि, महुआ मोइत्रा का यह मामला अयोग्यता का नहीं है बल्कि उन्हें पद से हटाने का है।
महुआ मोइत्रा पर पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने का आरोप लगा था। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है। इसलिए यह मामला संसद की एथिक्स कमिटी के सामने आया। उन्हें दोषी पाया गया और उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई।
क्या इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
सुप्रीम कोर्ट संसद के नियमों या उसकी शक्तियों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट इस पर अपनी राय दे सकता है कि संसद में किया गया कोई भी कामकाज या कार्रवाई कानून के मुताबिक हुई है या नहीं। एक राजनीतिक विशेषज्ञ का कहना है, इसलिए सदन की कार्यप्रणाली को चुनौती नहीं दी जा सकती।
संविधान के अनुच्छेद 122 में कहा गया है कि प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आधार पर संसद की किसी भी कार्यवाही पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। महुआ मोइत्रा के पास सदन के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में राजाराम पाल मामले में जो फैसला दिया था, वह महुआ मोइत्रा के मामले पर भी लागू होता है।
बसपा सांसद राजाराम पाल
दिसंबर 2005 में बीएसपी सांसद राजाराम पाल समेत 12 सांसदों को निष्कासित कर दिया गया था। उन पर नकदी लेने का भी आरोप लगाया गया था। उन सभी सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह मामला तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष आया था।
जनवरी 2007 में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इन सांसदों को बड़ा झटका दिया। पीठ ने उनकी दलीलों को खारिज कर दिया और सांसदों को निष्कासित करने के संसद के फैसले को बरकरार रखा।
विशेषाधिकार समिति के नियम कौन निर्धारित करता है?
लोकसभा में विशेषाधिकार और नैतिकता पैनल (एथिक्स कमेटी) दोनों एक ही विंग के अंतर्गत आते हैं। एथिक्स पैनल लोकसभा सांसदों के खिलाफ आम जनता की शिकायतों की जांच करने वाली एकमात्र समिति है। संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 विशेषाधिकारों से संबंधित हैं। विशेषाधिकार के नियम संसद द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में संसद या राज्य विधानमंडल के पास विभिन्न विशेषाधिकार प्रदान करने वाले नियम बनाने की शक्ति है। इन नियमों में विशेषाधिकार प्रावधानों का उल्लंघन। विशेषाधिकार हनन के मामले में सजा का प्रावधान है।
क्या सुप्रीम कोर्ट में मामला टिकेगा?
सदन के पास किसी सदस्य को सदन से निष्कासित या बर्खास्त करने की शक्ति है। लेकिन, अदालत यह देख सकती है कि उस समय क्या विशेषाधिकार मौजूद थे। इस आधार पर सदस्य की सदस्यता बनी रह सकती है या समाप्त हो सकती है।
