मुंबई: बचपन में हर किसी का सपना होता है कि वह बड़ा होकर डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट, वैज्ञानिक या कुछ ऐसा बनेगा जिससे उसकी एक अलग पहचान हो। हालांकि, अक्सर जिंदगी में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जो सपनों को चकनाचूर कर देती हैं। ऐसे में उन्हें समय के अनुसार काम करना पड़ता है। इसके बावजूद वे उस क्षेत्र में कुछ ऐसा कर जाते हैं कि उनके काम की चौतरफा तारीफ होती है। दुनिया भी उनकी तरफ आदर और सम्मान से देखती है। ऐसे लोगों में भारत के जाने माने उद्योगपति रतन टाटा भी शामिल हैं। आज रतन टाटा का जन्मदिन है और वह 86 साल के हो गए हैं।
रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को मुंबई में हुआ था। रतन टाटा का बचपन का सपना एक आर्किटेक्ट (वास्तुकार) बनने का था। उनके पिता का नाम नवल टाटा और माता का नाम सोनू टाटा था। नवल टाटा जमशेदजी टाटा के छोटे बेटे थे। रतन टाटा उनके दत्तक पुत्र थे। जमशेदजी टाटा, टाटा ग्रुप ऑफ़ कंपनीज के संस्थापक थे। नवल टाटा चाहते थे कि रतन टाटा इंजीनियर बनें। अपने पिता की इच्छा के अनुरूप उन्होंने इंजीनियरिंग को करियर के रूप में चुना। ये बातें उन्होंने खुद कुछ दिन पहले फ्यूचर ऑफ डिजाइन एंड कंस्ट्रक्शन पर आयोजित एक ऑनलाइन सेमिनार में बताईं।
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रतन टाटा के बचपन में माता-पिता का तलाक
1948 में जब रतन टाटा दस साल के थे, तब उनके माता-पिता का तलाक हो गया। और उसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी नवाजबाई टाटा ने किया। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा चैंपियन स्कूल, मुंबई से पूरी की और एक वास्तुकार बनने की इच्छा के साथ, रतन टाटा ने अमेरिका में कॉर्नेल विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। 1956 में कॉर्नेल विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद, वह आर्किटेक्चर (वास्तुकला) में अपना करियर बनाना चाहते थे। उनका मानना है कि वास्तुकला मानवता की गहरी समझ पैदा करती है।
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रतन टाटा को आर्किटेक्ट न बन पाने का अफसोस नहीं
रतन टाटा कहते हैं कि मेरे पिता चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं। इसलिए मैंने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए इंजीनियरिंग का कोर्स किया और इंटर्नशिप के लिए टाटा स्टील के जमशेदपुर प्लांट में आ गया। लेकिन मुझे आर्किटेक्ट न बन पाने का अफसोस नहीं है। मुझे अफसोस बस इस बात का है कि अपनी डिग्री पूरी करने के बावजूद, मैं अपने सपनों की नौकरी के लिए प्रैक्टिस नहीं कर सका। रतन टाटा 1961 में टाटा समूह में शामिल हुए और 1991 में समूह की अध्यक्षता संभाली। उन्होंने दिसंबर 2012 तक समूह का नेतृत्व किया। फिलहाल वह टाटा ग्रुप के अंतरिम चेयरमैन हैं।
