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विश्व को वृक्ष-वनस्पति प्रेमी विकास तंत्र की आवश्यकता

– हृदयनारायण दीक्षित

वातावरण में तनाव है। पृथ्वी का ताप बढ़ रहा है। सभी जीव व्यथित हैं। प्रकृति में अनेक जीव हैं। सब शुद्ध प्राण वायु पर निर्भर हैं। प्राण वायु का मुख्य स्रोत वनस्पतियां हैं। भारतीय राष्ट्रजीवन में वनस्पतियां, औषधियां देवता की श्रेणी में हैं। पीपल, बरगद, नीम, बेल आदि वृक्षों की उपासना होती है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि, ”पीपल का वृक्ष मैं ही हूं।” भारत की तरह दुनिया के किसी भी अन्य देश, संस्कृति व सभ्यता में वनस्पतियों और वृक्षों को नमस्कार नहीं किया गया। वनस्पतियों के कारण पर्यावरण शुद्ध रहता है। दुर्भाग्य से सारी दुनिया में वन क्षेत्र घटा है। भूमण्डलीय ताप बढ़ा है। वर्षा चक्र गड़बड़ाया है। यहां भारत में वैदिक काल से लेकर पुराण और महाभारत में वनस्पतियों और वृक्षों को विशेष आदर के साथ याद किया गया है। उन्हें देवता जाना गया है। हिन्दू मन वृक्ष वनस्पति की कटान पर आहत होता है। विकास का आधुनिक माडल वनस्पति प्रेमी नहीं है। विश्व को वृक्ष वनस्पति प्रेमी विकास तंत्र की आवश्यकता है।

वृक्ष बोलते हैं संभवतः। सुनते अवश्य हैं। उनसे वार्ता करना आनंद का अनुभव है। एक शोध के अनुसार जिस पौधे से प्रेमपूर्ण वार्ता होती है, वह जल्दी बढ़ता है। पौधों को ध्यान और प्रेम से देखने वाले प्रसन्न रहते हैं। पेड़ पौधे आपस में भी बातें करते होंगे। वे वृक्ष प्रेमी को देखते ही प्रसन्न हो जाते हैं। वे कुल्हाड़ी लेकर आने वाले ‘पेड़ कटवा’ को देखकर सहम जाते हैं। गहन उदास होते हैं। वृक्ष वनस्पति हमारे परिजन हैं। इन्हें खिलने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। बीज से वृक्ष, वृक्ष से फूल और फूलों से बीज का वर्तुल पूरा होना चाहिए।

वनस्पतियां ढेर सारी हैं लेकिन सोम वैदिक पूर्वजों की सर्वाधिक प्रिय वनस्पति है। ऋषियों ने सोम को बहुत बड़ा देवता बताया है। ऋग्वेद के नवें मण्डल में 144 सूक्त हैं। इन सभी सूक्तों के देवता सोम हैं। ऋग्वेद में सोम का अनेक प्रसंगों में उल्लेख है। सोम को सारी वनस्पतियों का राजा भी कहा गया। (9.114.2) सोम वनस्पति से रस निकाला जाता था। वैदिक अभिजन सोम को स्फूर्ति प्रदान करने वाला पेय मानते थे। सोमरस का प्रयोग पीने के लिए तो किया ही जाता था। यज्ञ में इस रस की आहुतियां भी दी जाती थीं। ऋग्वेद के अनुसार सोम देवताओं को प्रिय भी था। पूर्वज मानते थे कि सोमरस पीने से मनुष्यों को अमृत्व की प्राप्ति होती है। आर्यों की ईरानी शाखा में ‘होम’ वनस्पति की चर्चा है। पारसियों के धर्मग्रन्थ अवेस्ता में सोम को होम लिखा गया है। पूर्वज सैकड़ों वर्ष पहले वनस्पतियों के गुण धर्म से परिचित थे।

ऋग्वेद में औषधि विज्ञान सम्बंधी एक सूक्त के देवता औषधि हैं। ऋषि कहते हैं, ”हे औषधियों आपके सहस्त्रों नाम हैं। सहस्त्रों अंकुर हैं। आप हमें आरोग्य दें।” वे औषधियों की रोग निवारक शक्ति की तुलना घोड़े की शक्ति से करते हैं। स्तुति है, ”आप गतिशील घोड़े की तरह रोगों को तेजी से दूर करती हैं। आप हमें सुख दें।” खास बात यह है कि वे औषधियों को माता बताते हैं। कहते हैं कि, ”आप माता की तरह पालन गुणों से युक्त हैं। हमारी प्रार्थना सुनें।” वनस्पतियां औषधियां माता हैं। ऋषि कहते हैं कि, ”कुछ औषधियां निकट हैं। कुछ दूरी पर हैं।” कवि को विश्वास है कि, ”औषधियां उनकी प्रार्थना सुनती हैं।” अथर्ववेद में भी औषधियों वनस्पतियों को देवता कहा गया है। अथर्ववेद का एक पूरा सूक्त औषधियों पर ही है। ऋषि कहते हैं कि, ”कुछ औषधियां लाल रंग की हैं। कुछ श्वेत हैं। कुछ भूरी हैं। कुछ काली हैं। कुछ कई रंगों वाली हैं। पृथ्वी माता हैं। आकाश पिता हैं। औषधियां भी इसी परिवार की हैं। ऋषि कहते हैं कि, ”औषधियों के पिता आकाश हैं।” यहां औषधियां वनस्पतियां माता पृथ्वी व पिता आकाश की परिजन हैं।

रोगों के कारण होते हैं। कुछ रोग मनुष्य की अपनी गलती से पैदा होते हैं। कहते हैं कि, ”जल और औषधियां हमारे पाप से उत्पन्न यक्षमा रोग दूर करें।” कुछ औषधियां सर्वसुलभ हैं। कुछ औषधियां खरीदने से उपलब्ध होती हैं। कहते हैं, ”क्रयरहित औषधियां मनुष्यों, अश्वों को स्वस्थ रखें।” वनस्पतियां मनुष्य को स्वस्थ रखती हैं। आम महुआ आमला रसपूर्ण है। आमला युवा बने रहने का रसायन है। औषधियां, वनस्पतियां अनेक प्रकार की हैं। कहते हैं, ”गुच्छों वाली, एक कोंपल वाली और अनेक शाखाओं वाली औषधियों का आवाहन करते हैं।” प्रत्येक जीव में रोगों से लड़ने की क्षमता होती है। इसे रोग निरोधक क्षमता कहते हैं। अथर्ववेद में स्थान के आधार पर भी औषधियों के भेद किए गए हैं। एक मंत्र (8.7.17) में कहते हैं, ”अंगिरा द्वारा विवेचित औषधियां पर्वतीय क्षेत्रों व समतल मैदानों में उगती हैं। वे हृदय को सुख शांति देती हैं।” कुछ औषधियों को अमर भी बताया गया है। औषधियां जीव रक्षक हैं।

वैदिक काल के समाज को पिछड़ा बताने वाले नोट करें। वैदिक काल के मनीषी ज्वर की आवृत्ति से परिचित थे। ऋषि कहते हैं, ”कुछ ज्वर एक दिन छोड़ कर आते हैं, कुछ 2 दिन बाद और कुछ बिना निश्चित समय के ही आते हैं। ऋषि की इच्छा है कि, ”ऐसे ज्वर आलसी लोगों के पास चले जाएं।” वैदिक समाज में कर्म प्रधानता है। आलसी की भर्त्सना है। ज्वर और भी कई प्रकार के होते हैं। कहते हैं, ”तपाने वाले, हिलाने वाले, भड़काने वाले, ठण्ड के साथ आने वाले और दुर्बल करने वाले ज्वर को हमारा नमस्कार है।” यहां नमस्कार ज्वर को दूर भगाने के लिए किया गया है। ज्वर अकेला नहीं होता। इसका अपना परिवार है। अथर्ववेद में कहते हैं, ”ज्वर अपने भाई कफ के साथ आता है। खांसी उसकी बहन है। वह बहन के साथ आता है। यक्षमा इसका भतीजा है।” बीमारियों की व्याख्या रिश्तों में करना मजेदार है।

एक प्रतिष्ठित वनस्पति है गुग्गल। आधुनिक आयुर्विज्ञान इसे रोग निरोधक क्षमता बढ़ाने वाली औषधि मानते हैं। बताते हैं कि गुग्गल के प्रयोगकर्ताओं के पास कोई रोग नहीं आते। एक मंत्र में पील व जटामांसी को महत्वपूर्ण औषधि बताया गया है। औषधियां प्राणरक्षक हैं। प्राण से ही औषधियां लहराती हैं। मेघों का वर्षा करना प्राण का चमत्कार है। एक सुन्दर सूक्त में कहते हैं कि प्राण औषधियों के समक्ष गर्जन करते हैं। औषधियां शक्तिशाली होती हैं। प्राण औषधियों पर जल वर्षा करता है। औषधियां प्रसन्न होती हैं। प्राण ही रोग व मृत्यु के कारण हैं। कहते हैं कि, ”तब अथर्वा द्वारा रोपित अंगिरा वंशजों व मनुष्यों द्वारा निर्मित औषधियां प्रकट होती हैं।” एक वनस्पति पीपली है। अथर्वा के रचे सूक्त में पीपली स्वयं ही बोलती है, ”जिस प्राणी द्वारा हमारा सेवन किया जाएगा वह कभी नष्ट नहीं होगा।”

वनस्पतियों के अपने आकर्षक रंग रूप हैं। तमाम वनस्पतियां रोगोपचार के लिए औषधियां भी हैं। वनस्पतियां औषधियां वैदिक काल के पहले से ही प्रणम्य हैं। अथर्ववेद के एक सुन्दर सूक्त (1.34) में ऋषि कवि अथर्वा एक लता देखते हैं। अथर्वा कहते हैं, ”मधुक मधुरता के साथ पैदा हुई है। हम इसे मधुरता के साथ खोदते हैं-मधुजाता मधूनां त्वां खनामसि।” कहते हैं, ”हे लता आप मधुर हैं। हमें भी मधुर बनाएं।” आगे कहते हैं, ”हमारी जिव्हा का अग्रभाग मधुर हो। मूल भाग मधुर हो। हमारा घर से बाहर जाना मधुर हो। दूर जाना मधुर हो। वाणी मधुर हो। हम मधुरता से भी ज्यादा मधुर हो जाएं-मधुरस्मि माधुतरो मदुधान्ममधुत्तमत्तरः।” वैदिक ऋषि कवि अस्तित्व को नमस्कार करते हैं। यजुर्वेद (36.17) के शांति मंत्र में कहते हैं, ”अंतरिक्ष शांत हों। पृथ्वी शांत हों। जल शांत हों।” फिर कहते हैं, ”औषधियां शांत हों। वनस्पतियां शांत हों। सभी शक्तियां शांत हों। शांति भी हमें शांति दें।”

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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